Thursday, 27 April 2017

जाने कहाँ गए वह दिन

जाने क्यों अब चेहरे शर्म से गुलाब नही होते। जाने क्यों अब मस्त मौला मिज़ाज नही होते । पहले बता दिया करते थे जो दिल की बाते । जाने क्यों अब चेहरे वो खुली किताब नही होते । सुना है बिन कहे दिल की बात समझ लेते थे। गले मिलते ही दोस्त हालात समझ लेते थे । तब न फेसबुक थी न व्हाटसअप था न मोबाइल। एक चिट्ठी से ही दिलो के जज़्बात समझ लेते थे । सोचता हूँ हम कहाँ से कहाँ आ गये अब । प्रेक्टिकल बनते बनते भावनाये कहा गये सब । अब भाई भाई से समस्या का समाधान नही पूछता। अब बेटी नही पूछती माँ से ग्रहस्थी के सलीके। फिर छात्र ही क्यों गुरुचरणों में बैठकर गियान सीखे । परियों पढ़ाईयो की बाते अब किसे भाती है । अपनो की यादें अब कहाँ किसी को रूलाती है । अब कहाँ कृष्ण जो सुदामा को गले लगाता है। अब कहाँ कौंन गरीबों को अपना दोस्त बनाता है। जिंदगी में अब हम सब ज्यादा परेक्टिकल हो गये है। इंसानियत को खो कर सिर्फ रोबोट हो गये है। इंसान खो गए हैं कहीं इंसान खो गए हैं। जिंदगी के सभी मेले वीरान हो गए है । अब इंसान खो गए है । आपका अपना शहज़ाद अहमद

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