Thursday, 27 April 2017
जाने कहाँ गए वह दिन
Saturday, 22 April 2017
नशे की लत ने भिखारी बनाया
नई दिल्ली। शहजाद अहमद
देश की राजधनी दिल्ली में भिखारियों के बढते कदम के जनून में आध्े कुछ ऐसे मापिफया सक्रिय है जो बेबस और लाचार बच्चों को नशीला पदार्थ खिलाकर उनसे विभिन्न चैराहे और इलाकों में भीख मंगवाने के ध्ंध्े में सक्रिय है। दिल्ली का शायद ही कोई इलाका इससे अप्रभावित है। दिल्ली के हर इलाके में ऐसे बाल भिखारियों का जाल बिछा हुआ है ऐसी बात नहीं इस गोरखध्ंध्े से सभी अंजान है। लेकिन ऐसे संवेदनशील मामले को नजरअंदाज करना कांच प्रणाली पर उंगली उठाना सुभावित है। दिल्ली की लाल बत्ती, मिन्टो ब्रिज, जामा मस्जिद, चांदनी चैंक मेट्रो स्टेशन के गेट के बाहर रेलवे स्टेशन के गेट के बाहर आपको आसानी से ऐसे बाल भिखारी मिल जाऐंगे। नशे की वजह से इन्हें न तो लुभारी, दुपहरी, झमाझम बारिश और शरद हवाआंे का ध्ंध्े के दौरान कोई पफर्क नहीं पड़ता है। ये बाल भिखारी नशे में सिपफ एक ध्ुन में रहते है कि इन्हें भिक्षा के रूप में कुछ ऐसे पैसे मिल जाए मापिफयाओं के अलावा ध्ंध्े में कुछ ऐसे नशे आर्थिक रूप से बेहद कमजोर ऐसे माता-पिताभी शमिल है। जो अपनी लत को पूरा करने का कोई नशीला पदार्थ देकर उनको गोद में रखकर भिख मांगते हुए नजर आते है। यह बच्चे 2 साल तक के होते है। मापिफयाओं के चुंगल में कुछ ऐसे बाल भिखारी है जो घर से भागकर उनके चुंगल में पफंसकर नशे के अभ्यसाय हो जाते है। वहीं कुछ ऐेसे बाल भिखारी है जो तबके से कमजोर है और पेट की भूख मिटाने के लिए मापिफया द्वारा आक्राशक शब्जबाग दिखाने पर नशे के अभ्यसय होने के बाद इस मकड़ जाल से निकलने में असमर्थ है।
संवाददाता जब इस समाचार के संकलन के लिए निकला तो मिन्टों ब्रिज की लाल बत्ती पर एक ऐसे ही बाल भिखारी से उसकी मुलाकात हुई। उसकी उम्र दस वर्ष के आस-पास होगी। उसका नाम शिवा था तथा वह बिहार का रहने वाला था। संवाददाता ने शिवा को विश्वास में लाकर इस बात को खुरेदा और होले से मुस्कराया, भैया जी रहने दो, मैं इस पछडे में नहीं पड़ना चाहता। संवाददाता ने उसे समझाया तब जाकर वे राजी हुआ। और पैंट की जेब से पटाका 502 नम्बर का बंडल निकालकर उसमें से एक बीडी सुगलाते हुए जोरदार कश लिया और उसने कहा मेरी सौतली मां थी पिता नहीं थे। मां बहुत मारती पीडती थी जब मैं 7 वर्ष का था मेरी सौतली मां ने मुझे एक छोटी सी गलती पर बहुत मारा-पीटा, तो मैं गुस्से से वहां से भागकर दिल्ली आ गया। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से बाहर निकला तो मुझे एक अंकल मिले उन्होंने मुझसे पूछा बेटा कहां जाना है तो मैंने अपनी आप बीती बताई, तो वह मुझे अपने साथ अपने घर ले गये। खाना खिलाया तथा कपड़े दिये और कहा कि तुम मेरे बेटे की तरह हो। मैं तुम्हें काम दिलवाउंगा। कुछ दिन साथ रहने के बाद उन्होंने खाने में नशीला पदार्थ मिलाकर खिला दिया। नशे का अभियासय कर दिया। इसके बाद उनके कहने पर मैं इस ध्ंध्े में जुड़ गया। अब तो ददन अंकल नहीं है। उनका देहांत हो चुका है। मैं नशे की लत के कारण इस ध्ंध्े से जुडा हूं तथा पढा लिखा भी हूं कहीं नौकरी मिल जाए तो नशे के कारण शारीरिक काम कर सकूं। ऐसे में भिख मांगने में मजबूर था। रात में रेलवे स्टेशन पर या पफुटपाथ पर कहीं सो जाता हूं। और सुबह लाल बत्ती पर भिख मांगने निकल पडता हूं। सिपर्फ शिवा के ही नहीं इस तरह के दर्जनों बच्चे मिले जो इस ध्ंध्े में आने की उन्होंने अपनी कहानी कही।
सवाल उठता है कि इस दलदल में पफंसे बच्चों को समाज की मुख्यधरा में और इनकी कल्याण की दशा में सरकार कोई कारगर कदम क्यों नहीं उठा रही। ये अलग बात है कभी कभी विभिन्न एन.जी.ओ. द्वारा पहल करने पर सम्बन्ध् प्रशासन आपरेशन चलाकर इन बच्चों को सही राह दिखाने की चेष्टा करती है। लेकिन इस चेष्टा को खानापूर्ति कहे। जरूरत इस बात की है ऐसे बच्चों को बेहतर शिक्षा दी जाए तथा बच्चों केा नशे की लत के शिकार से छुटकारा दिलाने के लिए उचित प्रबन्ध् किया जाए।
सरकार इस संवेदनशील मामले में सचेत नहीं है। यह समस्या सिपर्फ दिल्ली में ही नहीं भारत के तकरीबन सभ्ीा बड़े शहरों में देखी जा सकती है। मुम्बई, कोलकता, मद्रास सहित अनेक शहरों में ऐसे बाल भिखारी है आसानी से दिख जाऐगे जो नशे की लत में पागल है।
समाचार संकलन के सिलसिले में संवाददाता की मुलाकात बिरजू नाम के एक बाल भिखारी से हुई। नशे की लत का शिकार बिरजू ने बताया कि वह नशे की अपफीम की लत उस समय लग गई जब उसकी उम्र नौ वर्ष की थी। उसके पिता को गहरी अपफीम लत थी। एक दिन पिता द्वारा घर में रखा गया अपफीम टेस्ट किया तो उसे अच्छा लगा उसके बाद पिता की गहरी नजरे बचाकर घर में रखा अपफीम सेवन के लिए चुराने लगा। इसके बाद उसे अपफीम की लत पड गई। अचानक सडक हादसे में उसके पिता की मौत हो गई। अब उसके सामने यह समस्या था कि नशे की लत को कैसे पूरा करें। घर में खाने को दो रोटी तक नसीब नहीं थी। ऐसे में वह अपनी लत के लिए पैसों का प्रबन्ध् कहा से करे। जिससे वह अपनी लत को पूरा कर सके। इसके बाद उसने भिख मांगने का ध्ंध शुरू कर दिया। बिरजू ने रोते हुए कहा मैं भिख मांगना नहीं चाहता था लेकिन नशे की लत ने मुझे मजबूर कर दिया। चाहकर भी इस मकड़जाल से नहीं निकल सकता। बिरजू की तरह हमेशा मासूम जैसे कुछ बाल भिखारी मिले जिनकी कहानी भी बिरजू की तरह थी। भिख मांगना नहीं चाहते थे लेकिन नशे ने उन्हें इस दलदल में पफंसा दिया।
Sunday, 2 April 2017
एक वेश्या का दर्द
मैं अपको एक चीज से अवगत कराना चाहता हुँ
जिंदगी हम सब जीते हे लेकिन किसी ने यह सोचा की जिंदगी मे बहुत उतार चाढ़ाओ जरुर आते हे में यह बात समाज की कर रहा हु लेकिन में समाज से हट कर वहाँ चलता हूं जिसे समाज गन्दा बोलता है ओर गलत नजर से देखता है वह जगह जहां हर शाम को दुल्हन की तरह सजती है उसको समाज कहता है वेश्या जो वेश्यालय में रहती है किसी ने यह जनने की कोशिश की के कैसे जीती है अपनी जिंदगी
दोस्तो आज में आपको उनकी जिंदगी के कुछ पल अवगत करना चाहता हु
वेश्या एक कोठे में अपनी जिंदगी जीती है लेकिन उसका दर्द कितना होता है जब मैने जाना तो आँखों से आंसू टपक पड़े दुनिया मे हर एक इंसान अपने पेट पालने के लिए कुछ न कुछ तो जरूर करता है चाहे वह रोड़ पर ठेला लगता हो या फिर वह भीख माँगता हो लेकिन एक औरत की कोई मजबूरी होती तो जब वह समाज मे मजदूरी करती है फिर भी उस औरत का इस्तेमाल किया जाता है
चाहे वह बड़ी कम्पनी हो या फिर मजदूरी हो लेकिन औरत को इज़्ज़त से काम नही मिलता
लीहजा वह मजबूर होकर वेश्या बन जाती है और एक वेश्यालय में रहने लगती है मेने एक वेश्या से बात की उसका नाम अनिता है उसने कहा में समाज मे एक गांव में खेती बाड़ी में काम करती थी खेती बाड़ी का जो मालिक था वह मेरे पर गलत नजर डालता था और एक दिन यह कहा में जो कहुगा वह तुम को करना पड़ेगा वरना में तुमको काम से निकाल दूंगा वह औरत मजबुरी में अपनी इज़्ज़त गांवा देती है अनिता ने कहाँ समाज मे जब ऐसा है तो मैने सोचा कि वेशयले चली आ आई यहा तो मेरी इज़्ज़त तो होगी और दो के चार पैसे मिलेंगे इस वजह से अनिता वेशयले में आ गयी अनिता जैसे यहाँ पर बहुत औरते मिल जायेगी ।
हमारा समाज इनको अपनाता नही है लेकिन समाज के कई घर इनके पेसो के पलते है जैसे कि इतिहास गवाह है वीरान जगह पर वेशयले बना वह जगह आबाद हो गई एक फ़िल्म है मंडी उस फिल्म में यही दिखाया गया है जगह को आबाद करती है
दिल्ली का रेड लाइट एरिया जी बी रोड जहा पर वेश्याएं रहती है खबर के लिए वहां गया तो मैने देखा की समाज इनको धुत्कारता है लेकिन समाज के कई पेट पलते है इनसे ।
एक वेश्या की जिंदगी बहुत दर्द भरी है
समाज मे कोई इंसान मर जाये तो कंधा देने दुश्मन भी आजाते है लेकिन एक वेश्या मर जाए तो कन्धा तो दूर की बात है उसको न तो कब्रस्तान न शमशान घाट पर दो गंज जमीन नही मिलती है
इंसान तो दूसरों पर आरोप लगाता तो है लेकिन अपने गिरवान में झांककर कभी देखा है कि मेरे अंदर कितने गुनाह किये है दुसरो पर आरोप लगाने में हिचकता तक नही है
अगर मेरे से कोई गलती हुई है तो माफी चाहता हूं
आपका अपना शहज़ाद अहमद